Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
प्रश्न का अनुवाद कर यद्य और दयो से उसका उत्तर देने के लिए महाराज वस्तिष्ठजी प्रतिज्ञा
करते हैं ।
महाराज वसिष्ठ ने कहा : भद्र, महाप्रलय पर्यन्त पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश-इन
सम्पूर्ण विशेष पदार्थों का विनाश हो जाने पर ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक सभी जीव जगत् फिर
जिस रीति से अनुभूत होता है, वह सानन्द आप सुनिये-यद्यपि यह मुनि लोग कहते हैं कि आकाश
तक के समस्त विशेषों का विनाश हो जानेपर जीवजगत् मुक्ति मेँ परिणत हो जाता है और केवल
चिन्मात्र ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है, जो वर्णनातीत परमार्थ चेतनघन है तथापि समझने की
बात यह है कि चिन्मात्र ब्रह्म जो बच जाता है, उसका यह जगत् एक तरह का हृदय है और उससे
अभिन्न है । सारांश यह निकला कि- (यद्यपि मुक्त पुरुषों की द्ष्टि से सभी जीवों की मुक्ति ही
है, किसी के लिए कुछ भी बाकी नहीं बचता, तथापि दुरे जो जीव हैं; उनमें हर-एकको तो
तत्वज्ञान हुआ नहीं है इसलिए उनकी द्वष्टि ग्रे अपनी-अपनी अविद्या तो नष्ट हुईं नहीं अतः बन्ध्न
का अनुभव होता है / जैसे चन्द्रलोक में जो मूलतः रहने वाले हैं अथवा अभी-अभी जो चन्द्रलोक
में जा पहुँचे हैं; उनकी द्रष्ट में चन्द्रजोक की स्वल्पस्वरूपता अत्यन्त असत् ही है, परन्तु शुमिपर
स्थित पुरुषों की दृष्टि से तो चन्द्र स्वल्परुप ही हैं, ऐसे ही यहाँ पर भी जानना चाहिए / इसी बात
को स्पष्ट करते हैं (कि) वही देव बद्धदृष्टि से जगत् को अपना स्वभाव और हृदय समझता है तथा
मुक्तदृष्टि से वैसा नहीं भी समझता । आत्मा के विषय में तात्तिवक विचार करके स्थित मुक्तस्वभाव
हम लोग तो जगत् को विनोद से यानी यह जगत् बाधित हो चुका है, पर उसका केवल जले हुए
वस्त्र के सदुश भास होता है-इस प्रकार के कौतुक से,कुछ है, यों देखते हैं, उसे वास्तविक रूप से
नहीं देखते । इससे तीनों दृष्टियों में जगत् आत्मा से अभिन्न ही ठहरता है, इसलिए इसका क्या
विनाश और क्या उत्पत्ति । वैसे इसका परमकारण विशुद्ध आत्मा अविनाशी है, वैसे ही उस आत्मा
का हृदयभूत यह जगत् अविनाशी ही है, जगत् अविनाशी है, तो महाकल्प, अवान्तर कल्प आदि
का व्यवहार हो सकता है, इस प्रकार की यदि कोई शंका उठाये, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योकि
महाकल्प आदि भी तो जगत् के अवयव हैं । जब उक्त रीति से जगत् नित्य ओर स्थायी है तब
उसके अंगभूत महाकल्प आदि अनित्य ओर अस्थायी कैसे हो सकता है ? ओर यह तो कहा नहीं
जा सकता कि कारण एक समय में नष्ट होकर फिर दुसरे समय में आ जाते हैं । इसलिए यही
मानना होगा कि सत्यस्वरूप जो कल्प, सृष्टि आदि हैं, वे ही जपमाला के अंगभूत मणियों के सदृश
बार-बार कालचक्ररूप से घूम फिर कर आते जाते रहते हँ । अतीत, भविष्यत् आदि कल्प ओर
सृष्टि आदि को लेकर कल्पादि में परस्पर जो भेदबुद्धि हो जाती है उसका एकमात्र कारण इस विषय
का व्यापक अज्ञान ही है, परन्तु इस अज्ञान को यदि हम देखते हैं, तो हाथ लगता नहीं, अतः
भेदबुद्धि कल्पादि की अस्थायिता आदि में हेतु नहीं हो सकती