Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
इन सब बातें से निष्कर्ष यही निकला कि अपनी अविद्या से अकेला ब्रह्म ही अनेक जीवों के
आकारो में और अनेक झृष्टि के रुषों में संसार धारण करता हैं तथा अकेला वही अपनी विद्या से
जीवभाव एवं सलार से मुक्त हो जाता है परन्तु यह निष्कर्ष ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योकि पहले
के ग्राकृत ्रलय हो जाने के बाद सम्पूर्णा जीवों की समष्टि हिरण्यगर्भ के तत्वज्ञान से अज्ञान की
निवृत्ति हो जाने पर उसके निभित्त इन सवक जीव और जयत् का बोध अवश्य हो जायेगा. ऐसी
स्थिति में सी की मुक्ति अवश्य माननी चाहिए, जब यह बात मानने को हम बाधित हो जाते हैं;
तब यह शंका रह जाती है कि एक बार जो ब्रह्म युक्त हो चुका, उसका जीवादिरूप संग्रार फिर कैसे
हुआ; इस आशय से श्रीरामजी प्रश्न करते हैं /
श्रीरामचन्द्र ने कहा : भगवन्, ये जितने प्राणी हैं, वे सब महाकल्प के विनाश में मोक्ष को प्राप्त
हो जाते हैं, इस स्थिति में फिर किसको किस तरह सृष्टिज्ञान उत्पन्न हो सकता है ?