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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 54

तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ सर्ग सभी वस्तुएँ अपने स्वभाव में ही रहती हैं, स्वभाव में न तो कोई क्रिया है ओर न कोई भेद ही है, अतः स्वभावभूत सन्मात्रवस्तु अविकारी एवं अद्वितीय है यह वर्णन।

33 verse-groups

  1. Verse 1घट, पट आदि का स्वरूप या भेद घटत्व, पटत्व आदि का उल्लेख किये बिना हो नहीं सकता / घट और घटत…
  2. Verse 2इसी अर्थ का फिर स्पष्टीकरण करते हैं / त्वम्‌ (तू), अहम्‌ (मैं), जगत्‌ इत्यादि जो शब्द हैं…
  3. Verse 3समुद्र, पर्वत, मेघ, पृथ्वी, विस्फोट आदि पदार्थों से भरा जगत्‌ भी ब्रह्म है यानी समुद्र आद…
  4. Verse 4तो कर्तव्य निर्धारण किया जाय, पर कारण ही कोई नहीं है
  5. Verse 5इस्री दृष्टि से सम्पूर्ण जगत्‌ की विचित्रता हटाई जा सकती है, यह कहते हैं / न तो ज्ञातापन,…
  6. Verse 6यदि कोई है, तो वह शिला के उदर के सदृश अत्यन्त घन, बाधवर्जित, अद्वितीय, जन्मरहित, सर्वात्म…
  7. Verse 7जीवन, मरण, सत्य, असत्य, शुभ, अशुभ जो कुछ है वह सब एक, अज निर्मल चिदाकाशरूप ऐसे है, जैसे त…
  8. Verse 8ब्रह्म का जीवरूप से विभाग कल्पित होने पर वह एक ही वस्तु चिदंश की प्रधानता से द्रष्टापन ओर…
  9. Verse 9इस तरह जगत्‌ स्वच्छ ब्रह्मरूप ही सिद्ध हुआ, वही स्वप्ननगर के सदृश परम चिदात्मरूप निर्मल आ…
  10. Verse 10हे श्रीरामजी, इन सब बातों से यह आप अच्छी तरह जान लीजिए कि यह सर्वात्म जगतस्वरूप पहले जैसा…
  11. Verse 11शान्तो मे परम शान्त चेतनाकाश का मध्य में उक्त रीति से प्रसिद्ध जो निर्विषय रूप है, वही जग…
  12. Verse 12सारा जग्रत्‌ निर्विषय वैतन्य से अभिन्न हैं, यह कहते हैं / जो कार्यरूप से उदित होता है ओर…
  13. Verse 13इसलिए इस सृष्टि का खरगोश के सींग के सदुश कोई कारण है ही नहीं, प्रयत्न से अन्वेषण करने पर…
  14. Verse 14जो किसी कारण के बिना भासित होता हे, वह भासित न हुआ ही भासित होता है, वह भ्रमात्मक है, यह…
  15. Verse 15कारण के बिना कार्य ही कैसे ओर उसकी सत्ता ही क्या ? यदि दिखाई पड़ा तो वह भ्रम ही है । पुत्…
  16. Verse 16जो अकारण भासता है, वह द्रष्टारूप चैतन्य ही अपने स्वरूप का त्यागकर सब रूप से उस प्रकार भास…
  17. Verse 17द्रष्टारूप वेतन कहाँ अपने स्वरूप को छोड़कर प्रकाशता हैं, इस पर कहते हैं / क्षणभर में शाखा…
  18. Verse 18अर्थसत्ता न रहने पर भी बोध अथाकार से प्रकाशित होता हैं, इस विषय में व्रष्टान्त देते हैं /…
  19. Verse 19बोध ही अर्थो के रुप में विकाग्नित होता है, ऐसी कल्पना कयो करते हैं; वटबीज के भीतर सूक्ष्म…
  20. Verse 20साकार बीज में पहले भीतर निराकार क्ट था, इसलिए वह पृथ्वी, जल आदि सहकारी कारणों की पास में…
  21. Verse 21परन्तु सम्पूर्ण भूतों का जब प्रलय हो जाता है, तब कौन-सा साकार बीज होगा और उसका सहकारी कार…
  22. Verse 22जयत्‌-शथक्ति से युक्त ब्रह्मा ही बीज होगा, इस पर कहते हैं / जो ब्रह्मवस्तु है, वह तो असल…
  23. Verse 23इसीलिए कारण का असंभव हैं, यह पहले कहा गया है यों कहते हैं / इस रीति से सत्य और मिथ्या को…
  24. Verse 24“अणुः पन्थाः विततः “ इत्यादि श्रुति प्रमाण से ईश्वर में अगुत्व की कल्पना यद्यपि हो सकती ह…
  25. Verse 25यदि यह कहिए कि जगत्‌ भी निराकार हैं, तब तो बीज आदि का अभाव होने से अनायास ब्रह्मरूपता ही…
  26. Verse 26इसलिए जो परम ब्रह्मतत्त्व है, वही यह जगद्रूप बनकर स्थित है, यह आविर्भूत होकर न तो कुछ स्व…
  27. Verse 27तब वह क्या चीज है, उसे कहते हैं / चिदाकाश ही (आकाशवत्‌ निर्मल चिति ही) चिदाकाशरूप हृदय चि…
  28. Verse 28वायु में स्पन्द की नाई चिदाकाश में उसका स्वरूप चिदाकाशरूप ही भासित होता है, अतः हम लोगों…
  29. Verse 29जैसे आकाश में आकाशरूप शून्यता अथवा जैसे जल में जलरूप द्रवत्व है, वैसे ही आत्मा में आत्ममय…
  30. Verse 30तब अविवर्त केसा है इसे कहते हैं / भद्र, हम लोगों का विस्तृत यह जो जगत्‌ है, वह प्रकाशमय,…
  31. Verse 31ऐसी प्रपंचरहित वस्तु की अप्रप्निद्धि शका तो बहुत स्थानों में निवृत्त की हैं, इसका स्मरण क…
  32. Verse 32जैसे वायु में स्पन्दन, जैसे जल में द्रवत्व है ओर आकाश में शून्यत्व प्रतीत होता है, वैसे ह…
  33. Verse 33जगत्‌ विन्यात्रस्वभाव है, यह जो सव तरह से कहा यया ह, उसे इकट्ठा करके उपदेश देते हुए उपहार…