Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
त्वमहं जगदित्यादि शब्दार्थो ब्रह्म ब्रह्मणि ।
शान्तं समसमाभासं स्थितमस्थितमेव सत् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी अर्थ का फिर स्पष्टीकरण करते हैं /
त्वम् (तू), अहम् (मैं), जगत् इत्यादि जो शब्द हैं, उनका अर्थ ब्रह्म ही है, शान्त ब्रह्म सबमें
एकरूप से ही भासनेवाला है, इसलिए अलग स्थित न होकर ही वह शब्दार्थरूप ब्रह्म अपने ही
स्वरूप में स्थित है