Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यत्तु ब्रह्म परं शान्तं का तत्राकारकल्पना ।
परमाणुत्वयोगोऽपि नात्र केवात्र बीजता ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जयत्-शथक्ति से युक्त ब्रह्मा ही बीज होगा, इस पर कहते हैं /
जो ब्रह्मवस्तु है, वह तो असल में परमशान्त है, उसमें आकार की कल्पना ही कैसी ? उसमें
परमाणुत्व का भी जब योग (सम्बन्ध) नहीं हो सकता, तब आकार की कल्पना तो दूर ही चली गई,
इसलिए ऐसी वस्तु में बीजरूपता आ ही नहीं सकती