Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
भारूपमिदमाशान्तं जगद्ब्रह्मैव नस्ततम् ।
अनादिनिधनं सत्यं नोदेति न च शाम्यति ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तब अविवर्त केसा है इसे कहते हैं /
भद्र, हम लोगों का विस्तृत यह जो जगत् है, वह प्रकाशमय, अपरिमित शान्त ब्रह्म ही है, वह
आदि और अन्त से शून्य ओर त्रिकाल में भी बाधित नहीं है, न तो उसका उदय होता और न अस्त
ही होता है