Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
विद्यते वटबीजान्तर्यथा भाविमहाद्रुमः ।
परमाणौ तथा सर्गो ब्रह्मन्कस्मान्न विद्यते ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
बोध ही अर्थो के रुप में विकाग्नित होता है, ऐसी कल्पना कयो करते हैं; वटबीज के भीतर
सूक्ष्मरप से स्थित वृक्ष के सद्ृश बोध के अन्दर स्थित जड्रात्मक प्रपव पहले से ही बोध में रहता
है, ऐसी कल्पना कयो नहीं करते ? यों श्रीरामभद्र शंका करते हैं ।
श्रीरामभद्र ने कहा : ब्रह्मन्, जैसे वटबीज के भीतर भावी महावृक्ष विद्यमान रहता है, वैसे ही
बोधात्मक परमाणु में भी यह सारी सृष्टि क्यों नहीं रह सकेगी ?