Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यत्रास्ति बीजं तत्र स्याच्छाखा विततरूपिणी ।
जन्यते कारणैः सा च वितता सहकारिभिः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
साकार बीज में पहले भीतर निराकार क्ट था, इसलिए वह पृथ्वी, जल आदि सहकारी
कारणों की पास में स्थिति हो जाने पर अंकुर आदि क्रम से उत्पन्न हुआ, यह बात तो मानी
जा सकती ह, परन्तु जगत् का जब महाप्रलय हो जाता है, तब न तो कड साकार वस्तु रहती
है ओर न सहकारी कारण ही प्रतीत होते हैं; इसलिए आपका दुष्टान्त नहीं घटता; यों महाराज
वस्तिष्ठजी समाधान करते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जहाँ बीज है, वहाँ पर तो उससे बड़ी-बड़ी शाखाएँ हो
सकती हैं, क्योकि वे विस्तृत शाखाएँ सहकारी कारणों से उत्पन्न होती है