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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जगन्नाम नभः स्वच्छं सद्ब्रह्म नभसि स्थितम् । नभो नभसि भातीदं जगच्छब्दार्थ इत्यजम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

घट, पट आदि का स्वरूप या भेद घटत्व, पटत्व आदि का उल्लेख किये बिना हो नहीं सकता / घट और घटत्व का परस्पर जो भेद है, उसका भी निरूपण किसी विथेकण को लिये बिना नहीं हो सकता; इसलिए उनके पृथक्ररण के लिए धर्म और धर्मी का जो कुछ विभाय आप मानेंगे, वह केवल कल्यनारूय ही होगा, क्योकि निरविकल्यरूप से एक-री भासमान वस्तुओ में असली विभाग तो होगा ही नहीं / ये जितनी वस्तु है; वे सभी भावरूप (सत्तामात्र ब्रह्मरूप) ही हैं; यह तो अनेक युक्ति. श्रुति आदि का दिग्दर्शन कराकर प्रिद्ध कर दिया है / ऐसी स्थिति में घटे घटत्वम्‌“ (घट में घटत्व हैं) इत्यादि शब्दों का निचोड़ अर्थ यही होगा कि ब्रह्म में ब्रह्म हैं! यों जो पहले श्राव प्रत्ययो के अर्थ का निष्कर्ष सिद्ध किया यया है, उनके फल का उपपादन करने के लिए आरम्भ करते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, घटत्व, पटत्व आदि भावों से जगत्‌ का स्वरूप यदि निचोड़कर सिद्ध किया जाय, तो वह आकाश के सदुश स्वच्छ एवं भेदरूप कलंक से निर्मुक्त ही सिद्ध होता है । घटत्व आदि भाव तो ब्रह्मरूप ही स्थित हैं, यह पहले ही बतला चुके हैं, इस दृष्टि को लेकर देखा जाय, तो घट, पट आदि भावों में किसी में किसी के प्रति कार्यकारणभाव नहीं है, क्योकि उस दृष्टि में यही ज्ञान रहता है कि आकाश ही आकाश में भासता है, वही (नभोरूप ब्रह्म ही) जगत्‌-शब्द ओर घटादि शब्दों का अर्थ है, वह तो जन्म आदि विकारों से शून्य ही है

सर्ग सन्दर्भ

तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ सर्ग सभी वस्तुएँ अपने स्वभाव में ही रहती हैं, स्वभाव में न तो कोई क्रिया है ओर न कोई भेद ही है, अतः स्वभावभूत सन्मात्रवस्तु अविकारी एवं अद्वितीय है यह वर्णन।