Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 48
सैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त अडतालीसवों सर्ग उत्तम वैराग्य दृढ होने पर पुरुष की जिन लक्षणों से स्थिति होती है तथा ज्ञान में निष्ठा हो जाने पर जिन लक्षणों से स्थिति होती है, उनका वर्णन।
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- Verses 1–3सबसे पहले केराग्य की दढता हो जाने पर पुरुष के जो विह होते हैं; उन्हे बतलाते हैं / महाराज…
- Verse 4उपयोगी भी बर्तन आदि ढो ले जाने में असामर्थ्य रखने के कारण जैसे पथिको की दृष्टि से वे केवल…
- Verse 5इन्द्रियो मेँ बार-बार लगे हुए भी भोगरूप इन्द्रियों के विषयों का वह अनुभव नहीं करता, क्योक…
- Verses 6–7उसीका विस्तार करते हैं / विवेकी जीव, एकान्त स्थाना में, दिगन्तों में, सरोवरों में, जंगलों…
- Verse 8अथवा कदाचित् प्रारब्धवश उन स्थानों में रह गया, तो भी वहाँ रहकर तत्त्ववेत्ता पुरुष की ही…
- Verse 9यह कहते हैं / इस तरह अभ्यास के बल से शान्त विवेकी पुरुष स्वयं ही जल में निम्न (नीचे के) भ…
- Verse 10वह परमपद कैसा है ? जहाँ पर विवेकी विश्रान्ति पाता हैं और किस तरह का निश्वय विश्रान्तिरूप…
- Verse 11बोधरूप आत्मा के सिवा न तो अर्थों का ज्ञान हो सकता है और न शून्य ही सिद्ध हो सकता है, इस प…
- Verse 12परमपदरूप जो वस्तु है, वह न बोधरूप है, न शून्यरूप है और न तो अर्थरूप ही है, यह आप जान लीजि…
- Verse 13परमपद में विश्रान्ति पा जाने पर विषयों की विरक्ति सिद्ध हो जाती है, यह कहते हैं / मनशून्य…
- Verse 14निरोधपद को प्राप्त यानी बहिर्मुख पुरुषों को आत्मनिष्ठा मेँ रुकावट डालनेवाले तथा अन्तर्मुख…
- Verses 15–16उस्र समय उसका मन किस तरह का रहता हैं 2 इस पर कहते हैं / भद्र, अवश्य जानने लायक आत्मवस्तु…
- Verse 17सम्पूर्ण मलों से रहित आत्मपद में स्थिति करनेवाला ज्ञानी अपने हृदय में स्थित अज्ञानरूपी अन…
- Verse 18भद्र, ऐसे पुरुषरूपी भास्कर को (सूर्य को) प्रणाम करना चाहिए, जिसका कि समस्त अंश रजोगुण से…
- Verse 19श्रीरामजी, मैं आपसे क्या कहूँ, जब भेद हट जाता है, चित्त अदृश्य बन जाता है, तब ज्ञानी की ज…
- Verse 20हे महाबुद्धे, रात-दिन की उत्तम भक्ति से चिरकाल के बाद प्रसन्न किया गया परमात्मा वर्णित पर…
- Verse 21श्रीरामजी ने कहा : हे तत्त्वज्ञो मे श्रेष्ठ मुनिवर, कौन ईश्वर है ? और वह भक्ति से कैसे प्…
- Verse 22महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महामते, ईश्वर न तो दूरी पर ही है और न अत्यन्त दुर्लभ ही है, म…
- Verse 23ईश्वर उसे कहते हैं; जो सबका नियन्त्रण करने में स्वतन्त्र हो, इस तरह स्वतन्त्र सबके प्रति…
- Verse 24इसीलिए श्रुति में बतलाई यह जन्मादिकारणता उसमें है, यह कहते हैं । यद्यपि वास्तव में आत्मा…
- Verse 25सबका आराध्य भी आत्मा ही है, यह कहते हैं । ये जितने स्थावर-जंगम पदार्थ हैं और ये जितने प्र…
- Verse 26जब अनेक जन्मों तक यह आत्मा यथाभिमत इच्छा से पूजित होता है, तब वह उससे प्रसन्न हो जाता है
- Verse 27जब अनेक सत्कर्मों से वह महादेव, महेश्वररूप आत्मा स्वयं प्रसन्न हो जाता है, तब पूजक के पास…
- Verse 28श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, परमेश्वररूपी आत्मा कौन दूत भेजता है, ओर वह आकर बोध कैसे देता…
- Verse 29महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, आत्मदेव के द्वारा भेजा गया दूत, जिसका नाम विवेक है ओर सदा…
- Verse 30यही विवेक नामक दूत क्रमशः वासनारूप प्राणी को बोध देता है ओर अविवेकी को इस संसार-सागर से प…
- Verse 31समस्त जगत् का प्रकाश करनेवाला ज्ञानरूप अन्दर का आत्मा ही सबसे बड़ा परमेश्वर है, वासनारूप…
- Verse 32जप, होम, तप, दान वेदपाठ, यज्ञ ओर क्रियाक्रमों से निरन्तर इसी आत्मा को नर, नाग, देवता ओर द…
- Verse 33इसी परमपिता परमात्मा का द्यौ मस्तक है, पृथ्वी पैर है, तारे रोम हैं, भूत अस्थि हैं, आकाश ह…
- Verse 34चैतन्यात्मा होने से यही सब जगह जाता है, जागता है ओर देखता है, इसलिए यही आत्मा लाखों, हाथ,…
- Verse 35विवेकरूपी दूत को जगाकर और चित्तरूपी पिशाच का विनाशकर यही चिदात्मा जीव को अपनी दिव्य अनिर्…
- Verse 36भद्र, समस्त संकल्प-विकल्पों का, विकारों का और अर्थसंकटों का परित्याग कर अपने ही पुरुषार्थ…
- Verse 37जिसमें मनरूपी पिशाच घूम रहा है, काम, क्रोधरूपी काले मेघो से जो सदा व्याकुल रहता है, ऐसे स…
- Verses 38–39विवेक ही पार कर देनेवाला है, इस बात को बतलाने के लिए संसार का समुद्ररूप से वर्णन करते हैं…
- Verse 40कहे गये प्रश्न-उत्तरों का संक्षेप कर उपसंहार करते हैं / पूर्व वर्णित शास्त्रविहित पूजन से…