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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

सबाह्याभ्यन्तरं शान्ता ज्ञतैवार्थतयोदिता । न संभवति भिन्नोऽर्थ इत्येव परमं पदम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

वह परमपद कैसा है ? जहाँ पर विवेकी विश्रान्ति पाता हैं और किस तरह का निश्वय विश्रान्तिरूप बन जाता हैं 2 इस पर कहते हैं । एकमात्र अज्ञान ही इन बाह्य ओर आभ्यन्तर दृश्य पदार्थों के रूप में परिणत हो गया है, अज्ञान कोई अलग पदार्थ है नहीं, इसलिए अज्ञान की शान्ति ही परमपद है, यह आप जानिए अथवा बाह्य ओर आभ्यन्तर जितने अर्थ दिखाई पड़ते हैं, वे आत्मा से अतिरिक्त कुछ नहीं है, इस प्रकार का अन्तिम साक्षात्कारात्मक जो निश्चय है, वह यदि अपने स्वरूपभूत आत्मा में दग्ध लकड़ी की आग के सदृश शान्त हो गया, तो वही परमपद है