Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verses 38–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, verses 38–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 38,39
संस्कृत श्लोक
अगाधमरणावर्तकल्लोलाकुलकोटरे ।
तृष्णातरङ्गतरले स्वमनश्चण्डमारुते ॥ ३८ ॥
महाजडलवाधारे संसारविषमार्णवे ।
इन्द्रियग्रामगहने विवेकः पोतको महान् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेक ही पार कर देनेवाला है, इस बात को बतलाने के लिए संसार का समुद्ररूप से वर्णन
करते हैं।
अगाध एवं मरणरूप भँवरों के कल्लोलों से व्याकुल कोटरो से युक्त तृष्णारूपी तरगों से तरल,
अपने मनरूपी झंझावातों से युक्त स्थावर आदि बड़े-बड़े भूतरूप जलकणों से व्याप्त, संसाररूपी
बड़ा विषम सागर इन्द्रियरूप मगरों से अतिगहन है, उसको पार करने के लिए विवेक ही एक बड़ा
भारी जहाज है