Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
निरोधपदमापन्नो निर्मना मौनमन्थरः ।
स्वभावे स्थित एवास्ते चित्रे कृत इवात्मवान् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
निरोधपद को प्राप्त यानी बहिर्मुख पुरुषों को आत्मनिष्ठा मेँ रुकावट डालनेवाले तथा
अन्तर्मुखपुरुषों को बाह्मनिष्ठा में रुकावट डालनेवाले परमपद में प्राप्त हुआ, मन से रहित,
मुनि के धर्मों से पूर्ण, शारीरिक कार्यों में शिथिल आत्मज्ञानी महात्मा अपने स्वभाव में ऐसे
निश्चल होकर स्थित रहता है, जैसे चित्र में अंकित पुरुष