Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
नार्थोपलब्धिर्नो शून्यमस्ति बोधात्मतां विना ।
इत्यन्तरनुभूतिस्थमाहुस्तत्परमं पदम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
बोधरूप आत्मा
के सिवा न तो अर्थों का ज्ञान हो सकता है और न शून्य ही सिद्ध हो सकता है, इस प्रकार
के भीतरी अनुभव में विद्यमान सर्व बाधों की अवधिभूत जो वस्तु है, वही परम पद है