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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 27

छब्बीसवाँ सर्ग समाप्त सत्ताईसवॉँ सर्ग॑ चित्त का स्पन्दन होने पर आत्मा में स्पन्दन का भ्रम हो जाता है, इससे जगत्‌ की सारी विभूतिर्यो उत्पन्न होती है, चित्त की शान्ति से आत्मा में स्पन्दनभ्रम की शान्ति होती है ओर इससे अपने असली स्वरूप में अवस्थान होता है - यह वर्णन ।

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  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, आप लौकिक पचड़ों से परे हो जाइए, अपनी आत्मा को शान्त बनाइए…
  2. Verse 2यह जो असीम आत्मा है, वह जब तक ज्ञान नहीं रहता, तब तक स्वयं एक होता हुआ भी सबके रूप में या…
  3. Verse 3प्रत्येक शरीर की उत्पत्ति और विनाश तथा सात दिते के नाय से आत्मा का नाप अनुभव में आता है अ…
  4. Verse 4भद्र, चिति के चमत्काररूप इस चंचल मन की एकमात्र चपलता के कारण ही ये सब जड़ संसार के खेल स्…
  5. Verse 5भद्र, शुभ्र मेघों में कल्पित वस्त्ररूपता वस्तुतः जैसे पहनने के काममें नहीं आती, वैसे ही इ…
  6. Verse 6श्रीरामजी, आप अनेक तरह के प्रपंच को देनेवाली अवस्तु में यानी मिथ्या पदार्थों में डूबिये म…
  7. Verse 7वह कौन वस्तु है, जिसकी भावना करनी चाहिए, इस पर कहते हैं / चित्रूपी अनन्त आकाश ही असली वस्…
  8. Verse 8उसका क्या फल है इस पर कहते हैं । इस प्रकार के निश्चय से युक्त हुए आप ही अज्ञानरूप बन्धन स…
  9. Verse 9दर्शनादि त्रिपुटी उसकी बाधक केसे ? क्योकि वह त्रिपुटी भी ध्यान-त्रिपुटी के ही समान हैं, इ…
  10. Verse 10सकस विशेष तो यह है कि जान निविकारी है यह कहते है / जैसे प्रतिपदा के चन्द्रमा के उदित होने…
  11. Verse 11तब विति की विश्रि द्रष्टा आदि तियुठी कैसे 2 इस प्रश्न पर एकमात्र विवर्तभाव से यह उत्तर दे…
  12. Verse 12इस रीति से देहद्ञष्टि वित्त की कल्यना करती है, देह और विक्त की द्रष्टि जीव की कल्पना करती…
  13. Verse 13ब्रह्मद्रष्टि सेतो सव एक ही हैं; यह कहते हैं । आत्मतत्त्व के ज्ञान से तो यह सब केवल शान्त…
  14. Verse 14हे श्रीरामजी, जैसे आकाश में अरण्य नहीं रहता अथवा जैसे बालू में तेल नहीं रहता या जैसे चन्द…
  15. Verse 15हे सत्यज्ञानियों में श्रेष्ठ श्रीरामजी, यह जगत्‌ की भ्रान्ति अविद्यमान ही है, अतः इससे आप…
  16. Verse 16भद्र, अभी तक जो आपको भ्रम रहा कि जगत्‌-वस्तु की ही सत्ता है और ब्रह्म सत्ता है ही नहीं, व…
  17. Verse 17थाली, पुरवा, घड़ा आदि जैसे केवल मिट्टी ही है, वैसे ही यह जगत्‌ केवल चित्त ही है। यह विचार…
  18. Verse 18हे श्रीरामजी, अब आप मेरे सौम्य उपदेश से अहंकार से पहले अलग हो जाइए, फिर सम्पत्तियों में इ…
  19. Verse 19तत्वज्ञान के बाद यदि प्रमाद हो जाय या प्रबल प्रारब्ध र जाय, तो उससे हर्ष-शोक भी होते रहें…