Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
निर्वाणो भव शान्तात्मा यथाप्राप्तानुवृत्तिमान् ।
सन्नेवासत्समः सौम्य स्फटिकादिव निर्मितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, आप लौकिक पचड़ों से परे हो जाइए, अपनी आत्मा
को शान्त बनाइए और जो कुछ भी प्राप्त हो जाय उसका अनुसरण करते चलिए। हे सौम्य,
जैसे स्फटिक पत्थर से बनाया गया चाँदनी में स्थित प्रतिमापुरुष सत् है तो भी उसमें दृष्टि
का निरोध न होने से असत् के तुल्य ही रहता है वैसे ही आप सत् होते हुए भी आत्मा की
अद्वैतदृष्टि का निरोध न करने के कारण असत् के सदृश ही वने रहिए
सर्ग सन्दर्भ
छब्बीसवाँ सर्ग समाप्त सत्ताईसवॉँ सर्ग॑ चित्त का स्पन्दन होने पर आत्मा में स्पन्दन का भ्रम हो जाता है, इससे जगत् की सारी विभूतिर्यो उत्पन्न होती है, चित्त की शान्ति से आत्मा में स्पन्दनभ्रम की शान्ति होती है ओर इससे अपने असली स्वरूप में अवस्थान होता है - यह वर्णन ।