Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
एकस्मिन्नेव सर्वस्मिन्संस्थिते विततात्मनि ।
नैकस्मिन्न च सर्वस्मिन्नानाताकलना कुतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो असीम
आत्मा है, वह जब तक ज्ञान नहीं रहता, तब तक स्वयं एक होता हुआ भी सबके रूप में यानी
अनेक रूपों में स्थित है, परन्तु ज्ञान हो जाने पर न तो वह एक है ओर न सर्वात्मक अनेक
है यानी न वह व्यष्टिरूप है ओर न समष्टिरूप ही है, क्योंकि ज्ञानकाल में सभी बाधित हो
जाते हैं, ऐसी स्थिति में उसमें अनेकरूपता की कल्पना ही कहाँ रही ?