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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

यथा नौयायिनः स्थाणुतरुशैलादिवेपनम् । यथा शुक्तौ रजतधीस्तथा देहादि चेतसः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

तब विति की विश्रि द्रष्टा आदि तियुठी कैसे 2 इस प्रश्न पर एकमात्र विवर्तभाव से यह उत्तर देते हैं / जैसे नाव पर यात्रा कर रहे पुरुष को तीरस्थ स्थिर वृक्ष, पर्वत आदि कम्पित हो रहे-से प्रतीत होते हैं अथवा जैसे शुक्ति में रजत-बुद्धि होती है, वैसे ही चिति में यह देह आदि अन्तःकरण को प्रतीत होते हैं