Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
द्रष्टा दृश्यं दर्शनं च चित एव विभूतयः ।
अतत्तत्संविदो नान्यदध्यानं ध्येयमस्ति च ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
दर्शनादि त्रिपुटी उसकी बाधक केसे ? क्योकि वह त्रिपुटी भी ध्यान-त्रिपुटी के ही समान हैं,
इस शंका पर कुछ विशेष कहते हैं /
द्रष्टा, दृश्य और दर्शन चित्त की ही विभूतियाँ है, तात्पर्य यह कि दर्शन प्रमाण से उत्पन्न
तथा वस्तु के अधीन है, पुरुष के अधीन नहीं, इसलिए वृत्ति से अभिव्यक्त परमार्थ चिति की
उसमें प्रधानता तथा अज्ञान की बाधकता (निवर्तकता) ही विद्यमान है, इस परिस्थिति में द्रष्टा
आदि परमार्थं भी चैतन्य की ही विभूति ठहरी । ध्यान न तो प्रमाणजन्य है और न वस्तु के
ही अधीन है, किन्तु पुरुष की इच्छा का अनुसरण करनेवाला है । इस स्थिति में ध्यान आदि
क्रियाविशेषरूप होने के कारण अविद्या की विभूतिरूप ही हैं, अतः ध्याता आदि बाधित हो जाते
हँ । दूसरी बात यह है कि जो जो जड़ वस्तु है, वह सब ज्ञान से भिन्न (पृथक्) दिखाई नहीं
देती अतः जितने दृश्य हैं, वे सब दर्शन का ही अनुसरण करनेवाले हैं । ध्येय तो ध्यान के
बिना भी अलग रहता है, अतः वह ध्यानानुसारी नहीं होता, यह विशेष है