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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

यथा देहादि चित्तस्य तथा देहस्य चित्तकम् । तथैव जीवः परमे पदे द्वैतमतः कुतः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस रीति से देहद्ञष्टि वित्त की कल्यना करती है, देह और विक्त की द्रष्टि जीव की कल्पना करती है और जीवद्वष्टि देह-चित्त की कल्पना करती हैं, यों सभी शुद्ध वैतन्य में ही विवर्त हैं; यह कहते हैं । जैसे देह आदि चित्त के हैं वैसे ही चित्त भी देहादि का है, इसी तरह जीव भी है, इस परिस्थिति में परम ब्रह्मपद में द्वैत ही कँ रहा ?