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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

आद्यन्तरहितं सर्वं व्योम चित्तत्त्वनिर्भरम् । शरीरोत्पत्तिनाशेषु का चित्तत्त्वस्य खण्डना ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक शरीर की उत्पत्ति और विनाश तथा सात दिते के नाय से आत्मा का नाप अनुभव में आता है अतः आत्मा की नानारूपता मान ली जाय, उसमे कौन-सी आपत्ति हैं 2 इस पर कहते हैं / जो चेतन आत्मवस्तु है, वह परिपूर्ण, आदि-अन्त से रहित, व्यापक तथा आकाश के तुल्य निर्मल है, इसलिए शरीर की उत्पत्ति एवं नाश होने पर उसकी उत्पत्ति या विनाश कैसे हो सकता है ? उसका क्या बन-बिगड़ सकता है ?