Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योमानन्तमेवास्मिन्नेयत्तास्ति समात्मनः ।
इत्येव परमं वस्तु वस्तु तत्परमस्तु ते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह कौन वस्तु है, जिसकी भावना करनी चाहिए, इस पर कहते हैं /
चित्रूपी अनन्त आकाश ही असली वस्तु है, उसका किसी तरह नाप नहीं हो सकता ।
जिनका आत्मा एकरूप बन गया है, उनके लिए यही सबसे बढ़-चढ़कर उत्तम वस्तु है। श्रीरामजी,
इसी एक वस्तु में आपका चित्त सदा रमण करे