Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 24
तेईसवाँ सर्ग समाप्त चौवीसवों सर्ग देह, इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि आदि के दोषों के सहित सांसारिक अपने दुःखसमूह का मंकि द्वारा वर्णन ।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यों मेरे कहने पर उस ब्राह्मण मंकि ने मेरे चरणों पर…
- Verse 2मंकि ने कहा : हे भगवन्, संशय के उच्छेद के लिए उपदेश देने में कुशल साधु पुरुष के अन्वेषण…
- Verse 3आज आपको पा जाने से सुर, असुर, पशु, पक्षी आदि समस्त देहो के सारभूत ब्राह्मणदेहों मे श्रेष्…
- Verse 4लओं के साथ खेद का ही विस्तारयूर्वक वर्णन करते हैं / बार-बार जन्म ओर बार-बार मरणरूप संसार…
- Verse 5छदा दु-खभ्रमयुक्त ही यह सार है, यह केसे 2 क्योकि छुख भी तो ससार में अनुभूत होते हैं; इस आ…
- Verse 6अथवा अत्यन्त प्रबलदुःख का अनुबन्धी होने के कारण कदो (एक प्रकार का मोटा अन्न खाकर जीवन धार…
- Verse 7उत्तरोत्तर भोगों के उत्कर्ष स्थान में अभिलाषाएँ बाँधकर बैठी हुई मेरी बुद्धि परम पुरुषार्थ…
- Verse 8इसमें दृष्टान्त बतलाते है / हे मुने, मेरा यह मन पीपल आदि के उड़ रहे सूखे पत्तों आदि के सं…
- Verses 9–10करंज आदि काँटेदार वृक्षलता के समान मेरी बुद्धि महाभयानक तथा कुटिल है एवं आयासयुक्त अज्ञान…
- Verse 11दुग्हारा कर्मो से ही उद्धार क्यों नहीं हो सकता; इस आशंका फर कहते हैं / जो कुछ मैंने नित्य…
- Verse 12पुत्र, कलत्र, बान्धव, चाकर आदि मेँ आसक्ति रखने से यह जीवन भी जीर्ण हो चला, परन्तु हे भगवन…
- Verse 13गड्ढे मे उत्पन्न हुए कण्टक वृक्ष की नाई, पुत्र, मित्र, पशु, धन आदि से कभी पूर्ण और कभी अप…
- Verse 14प्रचुर धन आदि से सम्पन्न तथा शस्त्र आदिकं के द्वारा घायल न हुए पुरुष को भी यह लक्ष्मी बार…
- Verse 15यह मेरा चित्त हजारों आशारूपी तरगों से अस्वच्छ, चारों ओर इधर-उधर खूब दौड-धूप लगाने पर भी अ…
- Verse 16इसमें दृष्टान्त देते हैं / कण्टकयुक्त, अपवित्र स्थान में रहनेवाला भीलावा के वृक्ष के समान…
- Verses 17–18शारो तथा सज्जनों की सगरति आदि उपायों से मन को रोक रखो, यदि ऐसा कहें. तो इस पर मेरा यह कहन…
- Verse 19हे भगवन्, यही कारण है कि चित्तरूपी मतवाले हाथी ने अवस्तु को ही वस्तुवत् मान लिया है हे…
- Verse 20सेवादि के द्वारा वश में लाये गये प्राज्ञो या अन्यान्य उपायों से भने भवसागर तैर जाने के लि…
- Verse 21इसलिए इस तरह चारों ओर से अनर्थो के कारण भयंकर भारी मोह में फँसे मेरे लिए संसारसागर से उद्…
- Verse 22हे भगवन्, शरत्काल के सदुश निर्मल, स्वच्छज्ञान, विवेकादि ज्योतिर्गणमण्डित साधु गुरु के प्…