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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

संपन्नमक्षतं सापि विप्रलम्भेन जृम्भते । अन्तः स्फुरितरत्नेहं भास्वरं वान्धकोटरम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रचुर धन आदि से सम्पन्न तथा शस्त्र आदिकं के द्वारा घायल न हुए पुरुष को भी यह लक्ष्मी बार-बार लुभाकर बहुत दूर तक खींच जाकर के शत्रुओं तथा चोरों आदि के अधीन में पहुँचाती हुई सारी सम्पत्तियों के नाश एवं अस्त्र-शस्त्रों के आधातादि के द्वारा आखिर में दुःखप्रद बनकर धोखा देने में ऐसे समर्थ रहती है, जैसे सर्पं के मस्तकमणि से प्रकाशमय हो रहा अन्धकारयुक्त गङ़ा, हृदय के भीतर रत्न लेने की स्फुरित हुई अभिलाषावाले तथा अपने अन्दर स्थित सर्प को न देखनेवाले पुरुष को अपने भीतर घुसाकर साँप के डँसने आदिरूप धोखा देने में समर्थ रहता है