Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
कण्टकद्रुमवल्लीव करालकुटिला मतिः ।
आयुरायासशालिन्या यामिन्येव तमोन्धया ॥ ९ ॥
न पुष्पिता न फलिता तृष्णा शुष्कलतेव नः ।
कर्म कर्मणि निर्मग्नं वासनाख्यमकर्मणे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
करंज आदि काँटेदार वृक्षलता के समान मेरी बुद्धि महाभयानक तथा कुटिल है एवं
आयासयुक्त अज्ञानान्धकार से आच्छादित निरन्तर विषयों की चिन्ता से ब्रह्मसाक्षात्काररूपी
प्रकाश के बिना ही मैंने अपनी सारी आयु व्यर्थ में एसे गँवा दी, जैसे दीपक आदि के प्रकाश
को प्राप्त किये बिना अन्धकार से आवृत रात को आँखें व्यर्थ में गँवा देती हैं। हे मुने, शुष्कलता
के सदृश यह तृष्णा न फूलती है, न फलती है ओर न विवेकरूपी रस को ही कुछ ग्रहण करती
हे, बार-बार व्यर्थ होने से यह नष्ट होकर भी नष्ट नहीं होती