Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

मनो मरणमप्राप्तं शून्यं दुःखाय वल्गति । शास्त्रसज्जनसंपर्कचन्द्रतारकधारिणी ॥ १७ ॥ अहंभावोल्लसद्यक्षा क्षीणा नाज्ञानयामिनी । अज्ञानध्वान्तमत्तेभसिंहः कर्मतृणानलः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

शारो तथा सज्जनों की सगरति आदि उपायों से मन को रोक रखो, यदि ऐसा कहें. तो इस पर मेरा यह कहना हैं कि ज्ञानफ़लविवेकरुपी सूर्य के उदय से अज्ञानकृपी रात जब तक कीत नहीं जाती, तब तक शार तथा सज्जनों के स्रम्पर्ककृपी चन्द्रमा एवं तारे आत्यन्तिक मनका भ्रम दूर करने में समर्थ नहीं हो सकते, इस आशय से कहते हैं / हे मुनिवर, शास्त्र एवं सज्जन महानुभावों की संगतिरूप चन्द्रमा और तारों को धारण करनेवाली, अहंकाररूपी उल्लसित हो रहे बालकल्पित यक्ष से युक्त यह मेरी अज्ञानरूपी रात अभी तक क्षीण नहीं हुई है, क्योकि अज्ञानान्धकाररूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह तथा कर्मरूपी तृण के लिए अग्नि एवं वासनारूपी रात का विनाशक विवेकरूपी सूर्य का अर्थात्‌ वासनारूपी रात के लिए सूर्यरूप विवेक का अभी उदय नहीं हो पाया है