Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
कल्लोलकलिलं शून्यं चेतः शुष्काब्धिदुर्भगम् ।
मामिन्द्रियार्थैकपरं न स्पृशन्ति विवेकिनः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह मेरा चित्त हजारों आशारूपी तरगों से अस्वच्छ, चारों ओर इधर-उधर
खूब दौड-धूप लगाने पर भी अर्थ प्राप्ति से शून्य है, इसी से सूखे समुद्र के सदृश दुष्कर होने
से भाग्यहीन तथा एकमात्र इन्द्रियों के वशीभूत हुए मुञ्जे विवेकी लोग अपने समीप नहीं फटकने
देते - मेरी उपेक्षा करते हैं