Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 209
ढो सौ सातवाँ सर्ग समाप्त दोसौ आठवाँ सर्ग जैसे प्रजा दूर देश में स्थित प्रयत्नं से अन्यत्र वध, बंधन आदि फल पाती है वैसे ही ब्रह्मा की इच्छा का वर्णन ।
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- Verse 1-अनिच्छतेहितेदुरदेशान्तरगतैः फलम् । प्रजा प्राप्नोत्यसंबद्धैरमूर्तरत्र क क्रम: ॥* इस प्र…
- Verse 2चूँकि ब्रह्म ही अज्ञानवश दृश्यबोध से दृश्य के रूप में प्रतीत होता है और ब्रह्मज्ञान से ब्…
- Verses 3–5संकल्पनगर में जिस जिस वस्तु का जिस समय जैसा संकल्प किया जाता है वह वह वस्तु उस समय वैसे ह…
- Verse 6लेकिन जो जगत् में हमारे संकल्पनगर की विलक्षणता का अनुभव होता है उसे वर-शाप संकल्प के तुल…
- Verse 7प्रकृत में प्रजाजन विधि-निषेध शास्त्रों द्वारा बोधित धर्म ओर अधर्म में से एक आस्थावश जो ध…
- Verse 8इस जगत् में जो जीव है उनके सृष्टिरूप अभिव्यक्ति के पूर्व उपलब्धि न होने के कारण पहले यह…
- Verses 9–10असत् जगत् का कुछ काल तक सत्तारूप से जो किंचित् भान होता है वह भी ब्रह्म के सत्यसंकल्प…
- Verses 11–18यह जगत् मायिक है, इसलिए इसका स्वभाव ही ऐसा है, यों श्रीवसिष्ठ जी प्रज्ञप्ति राजा के प्रश…
- Verse 19अथवा विधिप्रतिषेधरूप शास्त्रों को सफल वनानेवाली लोकमर्यादा ही ब्रह्म में बद्धमूल है स्थित…
- Verse 20वास्तव में तो आत्मा के जन्म और मरण ही नहीं होते हैं, किन्तु आत्मा स्वयं ही भ्रान्तिवश जन्…
- Verse 21जैसे द्रष्टा, दृश्य आदि जगत् कल्पनानगर एकमात्र कल्पना ही है वैसे वह स्वयं जगत्-सा प्रती…
- Verses 22–23वैसे ही मरण भी पूवदिहभ्रान्ति के स्फुरण का उपसंहार ही है और कुछ नहीं है, दृश्य जगत् के आ…
- Verses 24–25मणि, मन्त्र ओर औषधियों के विविध प्रभाव भी ब्रह्म के सत्यसंकल्पवश ही वैसे होते हैं, इस बात…
- Verse 26तो क्या प्रत्येक क्षण में प्रत्येक वस्तु की शक्ति, क्रिया आदि भेदो का संकल्प करनेवाले ईश्…
- Verse 27इस चिद्घन का यह स्पष्ट स्वभाव ही है कि यह स्वयं जिस जिसका संकल्प करता हे, क्षणभर में ही व…
- Verses 28–29संकल्पकल्पित पदार्थ स्वभाववश नानारूप से स्थित होने पर भी स्फुरणस्वभाव ब्रह्म में चिदात्मक…
- Verses 30–38इस प्रकार आदि, मध्य ओर अन्त रहित, अपरिमेयशक्तिशाली ब्रह्म सत्असत् दोनों रूप से स्थित है…