Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
क्षेत्रधर्मेण तेनास्य विनेयस्य महीपते ।
द्वे शरीरे विदौ सम्यक्कचतः प्रतिभात्मिके ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
लेकिन जो जगत् में हमारे संकल्पनगर की विलक्षणता का अनुभव होता है उसे वर-शाप संकल्प
के तुल्य समझना चाहिये, ऐसा कहते हैं।
मुनियों की यम, नियम आदि के सेवन से शुद्ध हुई संवित् वर और शाप से जैसे तत्-तत् व्यवहारक्षेम
यानी निग्रहानुग्रहसमर्थ होती है, ब्रह्मसंवित् भी वैसे ही होती है, यह अर्थ है। जो वर और शाप द्वारा
होता है उसे भी तपस्वियों के वर और शाप सिद्ध हों यों ब्रह्म की कल्पना से ब्रह्मसम्बंधी ही सत्यसंकल्प
समझना चाहिये