Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
प्रतिभैव विनेयस्य क्षेत्रपुण्येन तादृशी ।
तथैवोदेति सा धातुर्विपरीतवतो यथा ॥ ९ ॥
एकात्मनाहमद्यैष मृतोऽमी मम बन्धवः ।
रुदन्तीमे परं लोकं प्राप्तोऽयमहमेककः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
असत् जगत् का कुछ काल तक सत्तारूप से जो किंचित् भान होता है वह भी ब्रह्म के सत्यसंकल्प
से ही होता है, ऐसा कहते हैं।
राजन्,यह जगत् चिद्रूप ब्रह्म के संकल्प से ही कुछ काल के लिए सत् है, अतः जो ब्रह्म के जगत्रूप
से उन्मेष ओर निमेष हँ वे ही इस जगत् के उदय ओर प्रलय हैँ । राजा ने कहा : भगवन्, यदि जगत् ब्रह्म
के संकल्पवश सत् है तो पहले यानी सुषुप्ति ओर प्रलयकाल में क्यो प्रतीत नहीं होता ? पीछे यानी
जाग्रत् और सृष्टिकाल में किसलिए दिखाई देता है ? सदा विकार को प्राप्त हो रहा यह जगत् सुस्थिर
(सदा स्थायी) कार्य के समान भासमान कैसे है ? यह मुझे बतलाने की कृपा कीजिये