Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
तस्मादस्मिंश्चिदाकाशसंकल्पे जगदात्मनि ।
न संभवति किं नाम तत्संभवति वापि किम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या प्रत्येक क्षण में प्रत्येक वस्तु की शक्ति, क्रिया आदि भेदो का संकल्प करनेवाले ईश्वर की
कल्पना करते हो 2 इस प्रश्न पर नकारात्मक उत्तर देते है।
ईश्वर, प्रत्येक अपने संकल्पनगररूप त्रिजगत में प्रत्येक क्षण में प्रत्येक वस्तु का स्वयं संकल्प
करता है ऐसी ईश्वर की कल्पना हम नहीं करते अपितु जैसे बालक अपने खिलौनों का एक ही बार
संकल्प करता हे वैसे ही ईश्वर अमुक वर्ग का पदार्थ अमुक वर्ग के कार्य को करनेवाला हो, अमुक
जाति के पदार्थ इस प्रकार उत्पन्न हों ऐसी कल्पना करता है । उससे ही बीज, अंकुर आदि के क्रम
से पूर्व -पूर्व तृण आदि पदार्थ उत्तरोत्तर तृण आदि पदार्थो की कल्पना करता हे