Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

सहस्राण्येकतां यान्ति तथा सैव सुषुप्तकम् । अन्यथा स्वप्नसंकल्पसेनानुभवसंस्मृतौ ॥ २४ ॥ संकल्पस्वप्नपुरयोरिति को नानुभूतवान् । संविदाकाशमात्रेऽस्मिञ्जगत्यनुभवात्मनि ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

मणि, मन्त्र ओर औषधियों के विविध प्रभाव भी ब्रह्म के सत्यसंकल्पवश ही वैसे होते हैं, इस बात को दृष्टान्त के साथ कहते हैं। तुम्हारे कल्पनानगर के समान यहाँ जरा, मृत्यु और विनाश करनेवाले मणि, मन्त्र आदि के पृथक्‌ स्वभाव अमुक मन्त्र या औषधि इस प्रकार के प्रभाव से युक्त हों यों ब्रह्म संकल्प से ही उदित होते हैं इस प्रकार ब्रह्म के संकल्परूप त्रिलोकी में सब औषधियों तथा सब पदार्थों के स्वभाव संकल्पवश उदित हैं