Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verses 3–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 3-5
संस्कृत श्लोक
यत्र पुण्यं यदर्थं च क्षेत्रं ताभ्यां तथा कृतम् ।
यदि तद्विनियोज्यस्य तस्योन्नमति निष्कृतात् ॥ ३ ॥
तत्तस्मान्महतः पापाद्भागमेनोखिलं च वा ।
चितिशक्त्यात्म तत्पुण्यं परिभ्राम्योपशाम्यति ॥ ४ ॥
विनेयपापमल्पं चेत्क्षेत्रधर्मोऽधिकस्ततः ।
तत्पापं नाशयित्वा तच्छब्द एव विवल्गति ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्पनगर में जिस जिस
वस्तु का जिस समय जैसा संकल्प किया जाता है वह वह वस्तु उस समय वैसे ही अनुभूत होती है।
जैसे तुम्हारे इस संकल्पमय घर में जो यह प्रजा है वह तुम्हारे संकल्प के अनुसार बनी वैसे ही ब्रह्म
के संकल्प से सम्पन्न जगत् में भी यह प्रजा पूर्णरूप से ब्रह्मसंकल्प के अनुसार ही होती है। अपने
संकल्पनगर में यह सब जिस प्रकार का तुम्हारा स्थित है। तुम अपने संकल्पनगर में जिसका जैसा
संकल्प करते हो उसको वैसा ही देखते हो