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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verses 11–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, verses 11–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 11-18

संस्कृत श्लोक

बन्धूनामपि तत्रैव तदैवास्य तथैव च । प्रतिभा तादृशैवेति धातुक्षोभवतामिव ॥ ११ ॥ अत्युग्रैः पुण्यपापैः स्वैर्वा महात्मभिरीक्षिते । लक्ष्याण्यप्यन्यथा सन्ति नृणां चित्कल्पनावशात् ॥ १२ ॥ अचेतनं शवीभूतं तेऽपि पश्यन्ति तं मृतम् । रुदन्ति तं च दहने क्षिपन्ति सह बान्धवैः ॥ १३ ॥ विनेयः स यथान्येन संविद्रूपेण देहिना । ऽजरामरणमात्मानं वेत्ति स्थितमदुःखितम् ॥ १४ ॥ यथास्थितेन देहेन वेत्त्यसौ जीवितस्थितम् । मृतिं त्वदृश्येनान्येन क्षेत्रपुण्यविदेरितः ॥ १५ ॥ आविला संविदा संविच्छून्यया वेद्यते क्षणात् । न हि सन्नद्धगात्रस्य क्लेशोऽसन्नद्धमेदने ॥ १६ ॥ पश्यन्ति बन्धवोऽप्येनं तथैवामरतां गतम् । द्वयमित्येष लभते जीवितं मरणं समम् ॥ १७ ॥ इदमप्रतिघारम्भं भ्रान्तिमात्रं जगत्त्रयम् । न संभवति को नाम भ्रान्तौ भ्रान्तिविपर्ययः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जगत्‌ मायिक है, इसलिए इसका स्वभाव ही ऐसा है, यों श्रीवसिष्ठ जी प्रज्ञप्ति राजा के प्रश्न का उत्तर देते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : राजन्‌, इस चिदाकाश के संकल्पनगर में स्थित जगत्‌ में इस प्रकार का स्वभाव ही है कि यह सृष्टि में यानी स्वप्न और जाग्रत्‌ में उत्पन्न होकर प्रलय, सुषुप्ति और मोक्ष में आविर्भूत होता ही नहीं है और फिर क्षणभर में आविर्भूत हो जाता है । बालक के संकल्प के नगर के तुल्य तथा आकाश में स्थित केशों के वर्तुलाकार गोले आदि के समान ये सत्‌ असद्रूप सृष्टियाँ चिदात्मा में भासती हैँ । तुम संकल्पनगर का निर्माण कर अन्य संवित्‌ से यानी उसके प्रलय संकल्पवश स्वयं उसी क्षण में उसका विनाश करते हो यह जैसे तुम्हारा अपना स्वभाव है वैसे ही चिदाकाश के संकल्पनगर में जो उन्मज्जन निमज्जन है, उन्मेष तथा निमेष है वह ब्रह्म का निर्मल स्वभाव कचन (स्फुरण) ही है । इसलिए त्रिजगदाकाश केवल एकमात्र संविन्मय होकर आदि, अन्त शून्य ब्रह्माकाश ही है । चूँकि वह स्वयं ही जगत्‌ है, इस कारण वह परमेश्वर जो जो सोचता है वह करता भी है । आवरण रहित उसके सत्यसंकल्प से हजारों योजनो में बहुत से युगो से व्यवहित भी पुण्य, पाप आदि कर्म परलोक आदि में समीप में विद्यमान की तरह वैसे ही स्वर्ग, नरक, भोग, एेश्वर्य आदि कार्यकारी होते हैं जैसे कि स्वप्न होता है । जैसे स्फुरित हो रही चमक रही मणि में अपनी दीप्ति से ही कान्ति के उन्मज्जन और निमज्जन का आविर्भाव ओर तिरोभाव का अनुभव होता है वैसे ही चिदाकाशरूपी मणि में जगतों के सृष्टिप्रलयरूप परिवर्तन तथा नाना कर्मो के विचित्र विविध फलभोगरूप परिवर्तन भी अनुभूत होते है