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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 192

एक सौ नब्बेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्यानवेवां सर्ग अज्ञान से ब्रह्म का ही जगत्रूप से जैसे भान होता है तथा प्रबुद्धमात्र का जैसे परमपद स्थिति रूप निर्वाण होता है, इस विषय का भली भाँति वर्णन ।

13 verse-groups

  1. Verse 1पूर्वसर्गमें वर्णित रीति से प्रबोध को प्राप्त हुए श्रीरामचन्द्रजी सिद्धान्त पक्ष को स्वीक…
  2. Verse 2यौक्तिक दृष्टि से जगदाकार दिखाई देनेवाली यह भ्रान्ति (विक्षेपशक्ति प्रधान अविद्या) ही स्फ…
  3. Verse 3श्रीरामचन्द्रजी के कथन का अनुमोदन कर रहे श्रीवसिष्ठजी यह कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा :…
  4. Verse 4महाप्रलयकाल में अपने अवलम्बनभूत दिगृविभाग के बिना अपरिच्छिन्न चित्प्रकाश की असंभावना कर र…
  5. Verse 5अन्यत्र न देखे गये (उदाहरणशून्य) अत्यन्त आश्व्यभूत इसकी प्रमाणानुभव के बल से संभावना करनी…
  6. Verse 6सूर्यादि का प्रकाश भी दीवार आदि में निरपेक्ष स्वभाववाला होकर दीवार में प्रकाशित सा होता ह…
  7. Verse 7इस तरह निरालम्ब चित्‌की संभावना की सिद्धि होने से वही सृष्टि के आदि में जगत्‌ के आकार से…
  8. Verse 8एक रूप ही चित्‌ की द्रष्टा, दृश्य, दर्शनरूप त्रिपुटी स्वप्न आदि मे भी प्रसिद्धि ही है, ऐस…
  9. Verses 9–12जिस सृष्टिकाल में भासनेयोग्य पदार्थ, भान तथा भासयित्री (भासिका) स्वयंचित्प्रभा ही है उस स…
  10. Verse 13की दृष्टि में तो यह स्वभावभूत (ब्रह्मरूप) ही है, क्योकि कदाचित्‌ अकस्मात्‌ इस भास्य-भासक-…
  11. Verses 14–18तत्वज्ञान का अनुसन्धान कैसे होता है ? इस प्रश्न पर तत्त्वज्ञान का अनुसन्धान कहते है । उस…
  12. Verses 19–20जो चिदाकाशस्वरूप परमात्मा अजगत्‌मय अपने ही स्वरूप को जगत्‌ जानता है वही सृष्टि के आरम्भ म…
  13. Verses 21–22वर्णित तत्त्वज्ञान के अनुसन्धान प्रकार का उपसंहार करते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरे द्वा…