Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अहो नु सुचिरं कालं संभ्रान्ता वयमन्तरे ।
अपरिज्ञातमात्रेण संसारपरमाम्बरे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वसर्गमें वर्णित रीति से प्रबोध को प्राप्त हुए श्रीरामचन्द्रजी सिद्धान्त पक्ष को स्वीकार कर कहते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, ऐसी यदि बात है तो परतत्त्व विवर्तभूत यह जगत् सदा
सर्वपदार्थात्मा ब्रह्म ही है। यह न कभी उदित होता है और न कभी नष्ट होता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ नब्बेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्यानवेवां सर्ग अज्ञान से ब्रह्म का ही जगत्रूप से जैसे भान होता है तथा प्रबुद्धमात्र का जैसे परमपद स्थिति रूप निर्वाण होता है, इस विषय का भली भाँति वर्णन ।