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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

परमाकाशमेवेदमपरिज्ञातमात्रकम् । संसारतामिवास्माकं गतं चित्रमहो नु भोः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

महाप्रलयकाल में अपने अवलम्बनभूत दिगृविभाग के बिना अपरिच्छिन्न चित्प्रकाश की असंभावना कर रहे श्रीरामजी विस्मयपूर्वक पूछते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, अविच्छिन्न चित्‌प्रकाशदिगूविभाग के बिना सृष्टि के आदि में, प्रलयकाल में और मोक्ष में कैसे प्रकाशित होता है, यह महान्‌ आश्चर्य है। आलम्बनरूप दीवार के बिना भला दीपप्रभा का केसे भान होता है भाव यह कि आलम्बन के बिना जैसे प्रभा की प्रथा का असंभव है वैसे ही दिगूविभागरूप आलम्बन के बिना परमात्मा की भी प्रथा असंभाव्य है