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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verses 14–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, verses 14–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 14-18

संस्कृत श्लोक

बालवेतालवद्भ्रान्तिर्न विद्या जाग्रगापि हि । अविचारेण संरूढा विचारेणोपशाम्यति ॥ १४ ॥ कुत आसीदिति मुने नात्र प्रश्नो विराजते । सत एव विचारेण लाभो भवति नासतः ॥ १५ ॥ प्रामाणिकविचारेण प्रेक्षितं यन्न लभ्यते । तदेतदसदेवादि तत्तर्ह्यनुभवो भ्रमः ॥ १६ ॥ यन्नास्तीति परिच्छिन्नं प्रमाणैः सुविचारितम् । खपुष्पशशशृङ्गाभं तत्कथं लभ्यते सतः ॥ १७ ॥ सर्वतः प्रेक्ष्यमाणोऽपि यः कुतश्चिन्न लभ्यते । तस्य स्यात्कीदृशी सत्ता वन्ध्यातनयरूपिणः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्वज्ञान का अनुसन्धान कैसे होता है ? इस प्रश्न पर तत्त्वज्ञान का अनुसन्धान कहते है । उस समय सर्ग के आदि में न दृश्य था, न दर्शक था ओर न दर्शन ही था । मिथ्याज्ञान के कारण ही जैसे स्थाणु में पुरुष की प्रतीति होती हे वैसे ही आत्मा में द्वैत का भान होने के कारण चित्त में भेद का भान होता हे । सृष्टि के आदि में भास्य आदि नहीं है, भासक चिदात्मा तो अवश्य है । उस समय कारण का अभाव होने से केवल चिदाकाश ही द्वैत के रूप मेँ भासता है । भला बतलाइये तो सृष्टि के आदि में शुद्ध चेतन में वस्तुतः क्या कारण हो सकता है ? पदार्थ-दुष्टि के अभाव से चिति ही इस प्रकार जगत्‌ के रूप से प्रकाशित होती है जो यह जगत्‌ का भान है, यह न जाग्रत्‌ है, न सुषुप्ति है ओर न स्वप्न है, किन्तु तुरीय चिति ही यों प्रकाशित होती है । दृश्य का कदापि संभव न होने से केवल ब्रह्म ही द्वित के रूप से भासता है