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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verses 19–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

भ्रान्तिर्न संभवत्येव तस्मात्काचित्कदाचन । निरावरणविज्ञानघनमेवेदमाततम् ॥ १९ ॥ यत्किंचिज्जगदद्यात्र भातीदं परमेव तत् । परं परे परापूर्णे पूर्णमेवावतिष्ठते ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जो चिदाकाशस्वरूप परमात्मा अजगत्‌मय अपने ही स्वरूप को जगत्‌ जानता है वही सृष्टि के आरम्भ में इस प्रकार जगत्‌ के रूप से भासता है । जो यह जगत्‌ है वह परमात्मा ही है । शून्यता ओर आकाश के भेद विकल्प के विकास के समान जगत्‌ ओर परमात्मा का भेद विकल्प विकास अज्ञान विकसित हे