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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verses 9–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, verses 9–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 9-12

संस्कृत श्लोक

कुतोऽस्याः संभवो भ्रान्तेरिति चेद्दृश्यते मुने । तदेतदपि नो युक्तं भ्रान्त्यभावानुभूतितः ॥ ९ ॥ भ्रान्तिर्न संभवत्येव निर्विकारे ज्ञतापदे । यत्त्विदं भ्रान्तिताज्ञानं तत्तदेवेतरन्न तत् ॥ १० ॥ निरन्तरे निराद्यन्ते व्योम्नि शैलोदरेऽथवा । कुतोऽन्यताकल्पकं स्याज्ज्ञपदे चाविकारिणि ॥ ११ ॥ मिथ्यैवानुभवो भ्रान्तेः स्वप्ने स्वमरणोपमः । यदनालोकनं नाम शाम्यतीदं विलोकनात् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस सृष्टिकाल में भासनेयोग्य पदार्थ, भान तथा भासयित्री (भासिका) स्वयंचित्प्रभा ही है उस सर्गादि में सृष्टि के तुल्य भास रही चित्प्रभा ही विराजमान है। एक ही चित्प्रभा द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शन यों त्रिपुटीरूप होकर सृष्टि के आदि में सृष्टि के सदृश स्फुरित होती है। इसका (चित्‌ का) यही स्वभाव (मायाशक्ति) है कि यह इस तरह देदीप्यमान रूप में भासित होती है । यह बात जाग्रत्‌ में ही नहीं अपितु स्वप्न, संकल्प (मनोराज्य) और गन्धर्वनगर में भी अनुभव में आती है यानी वहाँ भी एक ही चिति द्रष्टा, दर्शन और दृश्य होकर स्फुरित होती है । प्रथम उदित हुई यह चित्प्रभा इस प्रकार प्रकाशित होती हे । अपने चिदाकाशरूप में चिदाकाशस्वरूपा यह इस जगत्‌ के रूप से भासती हे । सृष्टिरूप से इसका जो यह आदि-अन्तशून्य भान हे वही सृष्टियाँ हैं