Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
न भातं न च नाभातमिह किंचित्कदाचन ।
इदमित्थं स्थितं स्वच्छं शान्तमेव जगद्वपुः ॥ २१ ॥
अजममरमहार्यमार्यजुष्टं परमविकारि निरामयं समन्तात् ।
पदमहमुदितं ततं हि शुद्धं निरहमनेकमथाद्वयं विकासि ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
वर्णित तत्त्वज्ञान के अनुसन्धान प्रकार का उपसंहार करते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरे द्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञान के अनुसन्धान के उपाय से तत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर
जब तक भूमिकाओं के परिपाक के क्रम से यह सुन्दर अनुभव से युक्त हो दृढ़ नहीं होता है तब तक
विकल्पमुक्त होकर पाषाण की तरह सकल व्यापारो कों त्यागकर रहना चाहिये । अनादि संसार में
बार-बार भोगे हुए इस काल में वैराग्यवश त्यागे हुए बाह्य विषय का अज्ञानी कुपुरुष द्वारा इसका भोग
करो यों कहने पर भी ग्रहण नहीं करना चाहिये