Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 190
एक सौ अद्रासीरवो सर्ग समाप्त एक सौ नवासीवाँ सर्ग आतिवाहिक देहवाले प्रजापति के मनोरथरूप इस जगत् मेँ आधिभौतिकता भ्रमरूप है, यह वर्णन ।
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- Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, उस आद्य प्रजापति का यह आतिवाहिक शरीर चित् हो…
- Verse 4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, इस रीति से उक्त आदि प्रजापति का केवल आतिवाहिक शरीर यदि भ…
- Verses 5–6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, आतिवाहिक शरीर के भ्रमरूप दर्शन की स्वतः ही अनुभूति हो…
- Verses 7–12आतिवाहिक शरीर आधिभौतिक रूप से भावित होकर पृथिवी, शरीर आदिरूप पिंडाकार को देखता हे । चिदाक…
- Verses 13–14असत्य वस्तु में यह सत्य है इस बुद्धि से भावना करने के कारण जीव बन्धन में पड़ता है अपने अन…
- Verses 15–17शब्दराशिरूप वेदों से ही शीघ्र इधर-उधर चारों ओर के व्यवहारों की कल्पना करता है, क्योकि समष…
- Verse 18कहीं पर कुछ भी आधिभोतिकता नहीं है । आतिवाहिकता ही अभ्यासवश इस आधिभौतिक भावाना को प्राप्त…
- Verse 19मूलभूत सर्जनहार ब्रह्मा से ही इस प्रकार का यह मिथ्या अनुभवरूप महान् मोह आया है, इसलिए यह…
- Verse 20चिदेकरस ब्रह्म की इस तरह की दुर्दशा कहाँ संभव है, किन्तु यह सब संसार दुर्दशादि भ्रान्ति ह…
- Verses 21–89जगत् का अव्यय सकलकारण-कारण ब्रह्म से अतिरिक्त दूसरा कारण नहीं है । वह कार्यता के बिना का…