Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ज्ञानस्य ज्ञेयतापत्तिर्बन्ध इत्यभिधीयते ।
तस्यैव ज्ञेयताशान्तिर्मोक्ष इत्यभिधीयते ॥ १ ॥
श्रीराम उवाच ।
ज्ञानस्य ज्ञेयताशान्तिः कथं ब्रह्मन्प्रवर्तते ।
सा रूढा बन्धताबुद्धिः कथं वात्र निवर्तते ॥ २ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सम्यग्ज्ञानेन बोधेन मन्दबुद्धिर्निवर्तते ।
निराकारा निजा शान्ता मुक्तिरेवं प्रवर्तते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, उस आद्य प्रजापति का यह आतिवाहिक शरीर चित्
होने के कारण “कश्चत् ब्रह्मेति कथितः स्मृतः कश्चिद् विराडिति" यों विस्तार से वर्णित रीति से जिस
जिसकी जैसी कल्पना करता है काकतालीय न्याय से वह चिरकाल तक वैसे ही स्थित होता है, सत्य
संकल्पवती संवित् के स्वभाव से इस विश्व का भान हुआ है । इस जगत् की असत्यता के विषय में क्या
आश्चर्य है ? इस कारण केवल भ्रमस्वरूप होने से द्रष्टा, दृश्य और दर्शन रूप त्रिपुटी सत्य है यानी द्रष्टा
असत्य है, दृश्य असत्य है और दर्शन (वृत्ति) असत्य है, अथवा उक्त ब्रह्मात्मता के कारण सब कुछ
ब्रह्म ही हे ओर सत्य ही हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अद्रासीरवो सर्ग समाप्त एक सौ नवासीवाँ सर्ग आतिवाहिक देहवाले प्रजापति के मनोरथरूप इस जगत् मेँ आधिभौतिकता भ्रमरूप है, यह वर्णन ।