Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ज्ञानस्य ज्ञेयता नास्ति केवलं ज्ञानमव्ययम् ।
अवाच्यमितिबोधोन्तः सम्यग्ज्ञानमितिस्मृतम् ॥ ५ ॥
श्रीराम उवाच ।
ज्ञानस्य ज्ञेयता भिन्ना त्वन्तः केति मुने वद ।
उत्पाद्यो ज्ञानशब्दश्च भावे वा करणेऽथ किम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे
श्रीरामजी, आतिवाहिक शरीर के भ्रमरूप दर्शन की स्वतः ही अनुभूति होती है । सदा निरन्तर भान से
वह चिरकाल के अभ्यास से घनीभूत सा मालूम होता हे । जैसे राजा हरिश्चन्द्र आदि के स्वप्न की
चिरानुभूत के अनुरूप पुष्टता हुई वैसे ही ब्रह्मा को अपनी आतिवाहिकता अत्यन्त सत्य सी प्रतीत होती
हे