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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । कारणाज्जायते कार्यं नान्यथेत्येव निश्चयः । सर्वोपशान्तौ जगतामुत्पत्तौ नास्ति कारणम् ॥ १५ ॥ श्रीराम उवाच । महाप्रलयसंपत्तौ शिष्टं यदजमव्ययम् । तत्कथं नाम सर्गस्य न भवेत्कारणं मुने ॥ १६ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । यदस्ति कारणे कार्यं तत्तस्मात्संप्रवर्तते । न त्वसज्जायते राम न घटाज्जायते पटः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

शब्दराशिरूप वेदों से ही शीघ्र इधर-उधर चारों ओर के व्यवहारों की कल्पना करता है, क्योकि समष्टि मनरूप यह प्रजापति जो कुछ कल्पना करता है निश्चय रूप से वही हो जाता है। जो जिसमें अत्यन्त आसक्तिमान होगा वह उसे क्यो न देखेगा ? यों असत्यरूपा ही जगद्भ्रान्ति प्रौढ़ता को प्राप्त हुई है। ब्रह्मा से लेकर मच्छर तक यह चिरकालिक स्वप्न- सा और इन्द्रजाल-सा असत्‌ जगत्‌ मिथ्या ही स्फुरित होता है । इस प्रकार आतिवाहिक की आधिभौतिकता (कठिनस्वभावता) उचित ही है, अनुचित नहीं हे