Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
बोधः केवलतारूपः सम्यग्ज्ञानं किमुच्यते ।
येन बन्धादयं जन्तुरशेषेण विमुच्यते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, इस रीति से उक्त आदि प्रजापति का केवल आतिवाहिक शरीर
यदि भ्रान्तिदर्शनमात्र हे, वह कठिनता को (शिलादि के तुल्य पुष्टता को) कैसे प्राप्त हुआ ? भला
स्वप्न में पारलोकिक फल आदि की अर्थक्रियाकारिता कैसे संभव है ?