Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verses 13–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वप्नार्थमृगतृष्णाम्बुद्वीन्दुसंकल्पितार्थवत् ।
मिथ्या जगदहंत्वं च भाति केशोण्ड्रकं यथा ॥ १३ ॥
श्रीराम उवाच ।
अहं त्वमयमित्यादिजगज्जठरमप्यलम् ।
कथं न जातं भगवन्सर्गादावनुभूतिमत् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
असत्य वस्तु में यह सत्य
है इस बुद्धि से भावना करने के कारण जीव बन्धन में पड़ता है अपने अन्दर बार-बार भावना करता है
उससे नानात्व का (द्रैतका) अनुसरण करता है। पहले वैदिक, लौकिक शब्दों की सृष्टि करता है और
उनका जाति आदि तत् तत् उपाधियुक्त अर्थ में संकेत करता है यानी यह शब्द इस अर्थ का वाचक है,
ऐसा संकेत करता है। संकेत से संज्ञाएँ और चेष्टाएँ करता हे । तदनन्तर ॐ उच्चार करने के उपरान्त
शब्द राशिरूप वेदों का गान करता है