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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 186

एक सौ चौरासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचासीवाँ सर्ग उन दोनों का गृह-आगमन, वहाँ भाईयों का क्रमशः क्षय और श्रीरामचन्द्रजी की प्राप्ति से कुन्ददन्त के मोहोच्छेद का वर्णन ।

10 verse-groups

  1. Verses 1–8कुन्ददन्त ने कहा : वृद्ध मुनि ने भी इतना कहकर ध्यान से आँखें मुँद लीं । प्राणवायु ओर मन क…
  2. Verse 9कदम्बतरू तपस्वी ने कहा : मेँ समाधि से विरत होकर एक क्षण भी नहीं रह सकता । मैं फिर शीघ्र ह…
  3. Verses 10–11हे निष्पाप, इस समय मेरा वास्तविक उपदेश भी अभ्यास के बिना तुम्हे नहीं लगेगा, अतः दूसरी युक…
  4. Verses 12–15वहाँ तुम उनके पास जाओ, क्योंकि उनके कुलगुरु वसिष्ठनामक मुनिश्रेष्ठ उन श्रीरामचन्द्र के लि…
  5. Verses 16–17श्रीरामजी ने कहा : हे गुरुवर, इत्यादि कथाओं को कहने में चतुर वह कुन्ददन्त उस दिन से सदा म…
  6. Verse 18इस प्रकार प्रश्न का उपोद्घात करके अव प्रष्टव्य अंश कहते हैं। वही यह मेरे समीप बैठा हुआ कु…
  7. Verses 19–21श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी के इतना कहने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ मुनिप्रवर वसि…
  8. Verse 22ज्ञानमात्र से मोह की निवृत्ति हो जाने से अन्य ज्ञातव्य, द्रष्टव्य और लब्धव्य का भी परिशेष…
  9. Verses 23–26यह आत्मचिति आपसे मैने जान ली हे । यह सब अखण्ड परमार्थघन आकाश में आत्मा से अनन्य जगत्रूप स…
  10. Verses 27–90अब मायासहित ब्रह्मतत्त्व का निष्कर्ष निकालकर उपसंहार करते है। जो-जो वस्तु जब जब जिस प्रका…