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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verses 1–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, verses 1–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 1-8

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । कुन्ददन्ते वदत्येवं वसिष्ठो भगवान्मुनिः । उवाचेदमनिन्द्यात्मा परमार्थोचितं वचः ॥ १ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । बत विज्ञानविश्रान्तिरस्य जाता महात्मनः । करामलकवद्विश्वं ब्रह्मेति परिपश्यति ॥ २ ॥ किलेदं भ्रान्तिमात्रात्म विश्वं ब्रह्मेति भात्यजम् । भ्रान्तिर्ब्रह्मैव च ब्रह्म शान्तमेकमनामयम् ॥ ३ ॥ यद्यथा येन यत्रास्ति यादृग्यावद्यदा यतः । तत्तथा तेन तत्रास्ति तादृक्तावत्तदा ततः ॥ ४ ॥ शिवं शान्तमजं मौनममौनमजरं ततम् । सुशून्याशून्यमभवमनादिनिधनं ध्रुवम् ॥ ५ ॥ यस्या यस्यास्त्ववस्थायाः क्रियते संविदा भरः । सा सा सहस्रशाखत्वमेति सेकैर्यथा लता ॥ ६ ॥ परो ब्रह्माण्डमेवाणुश्चिद्व्योम्नोन्तःस्थितो यतः । परमाणुरेव ब्रह्माण्डमन्तःस्थितजगद्यतः ॥ ७ ॥ तस्माच्चिदाकाशमनादिमध्यमखण्डितं सौम्यमिदं समस्तम् । निर्वाणमस्तंगतजातिबन्धो यथास्थितं तिष्ठ निरामयात्मा ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

कुन्ददन्त ने कहा : वृद्ध मुनि ने भी इतना कहकर ध्यान से आँखें मुँद लीं । प्राणवायु ओर मन के स्पन्दनरहित होने से वह चित्रलिखित जैसा हो गया। हम दोनों के विनय और स्तुतिमय वाक्यों से वार- बार प्रार्थना करने पर भी बाह्यवृत्तिशून्य होने के कारण संसार को न जानते हुए उसने फिर उत्तर नहीं दिया। मुनि के वियोग से उदास हुए हम दोनों उस प्रदेश से धीरे धीरे चलकर कुछ दिनों के वाद प्रसन्न बन्धु- बान्धवां से युक्त घर में पहुँचे इसके अनन्तर घर मेँ कुलदेवता के आराधनादि उत्सव कर नाना प्रकार की प्राचीन कथाएँ कहकर हम तब तक स्थित रहे जब तक वे सातो भाई प्रलयकाल में सप्त समुद्रो की भोति क्रम से विलीन न हो गये केवल वह एक मेरा मित्र ही आठवें समुद्र की भति विलीन होने से बचा रह गया । फिर कुछ काल के अनन्तर वह मेरा मित्र भी दिन के अन्त में सूर्य की भोति अस्त हो गया (मर गया) ओर उसके विरह दुःख से व्याप्त हुआ मैं अत्यन्त दुःखी हुआ। तब दुःखी हुआ मैं उस दुःख का नाश करने के लिए और उस प्राक्तन ज्ञान को आदरपूर्वक पूछने के लिए फिर उसी कदम्बतरू- तपस्वी के पास गया । वहाँ तीन महीने के अनन्तर वह मुनि समाधि से विरत हुआ । नम्रता के साथ मेरे प्रश्न करने पर वह इस प्रकार बोला

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ चौरासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचासीवाँ सर्ग उन दोनों का गृह-आगमन, वहाँ भाईयों का क्रमशः क्षय और श्रीरामचन्द्रजी की प्राप्ति से कुन्ददन्त के मोहोच्छेद का वर्णन ।