Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 186, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 186 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
यथा यत्र जगत्येतत्स्वयं ब्रह्म खमात्मनि ।
स्वरूपमजहच्छान्तं यत्र संपद्यते तथा ॥ १० ॥
ब्रह्म दृश्यमिति द्वैतं न कदाचिद्यथास्थितम् ।
एकत्वमेतयोर्विद्धि शून्यत्वाकाशयोरिव ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे निष्पाप, इस
समय मेरा वास्तविक उपदेश भी अभ्यास के बिना तुम्हे नहीं लगेगा, अतः दूसरी युक्ति सुनो और वैसा
ही करो । अयोध्या नाम की नगरी है । वहाँ दशरथ नाम के राजा हैं । उनके पुत्र राम नाम से प्रसिद्ध
हैं